Gangs of Wasseypur: Story of Shahid Khan

गैंग्स ऑफ़ वास्सेय्पुर का आज का सीन फिल्म के काफी शुरुआत का है, इस सीन में सरदार खान के अब्बू शाहिद खान की कहानी को दर्शाया गया है|
 
फिल्म का प्रसंग भारतीय स्वतंत्रता के पहले का है, तब कुरैशी अंग्रेज़ों की ट्रैन लूट कर काम चलाया करते थे और शाहिद खान उनसे लुटता था, पर अंततः उसको कुरैशियों के डर से और अपने होने वाले बच्चे की खातिर अपना घर छोड़ कर धनबाद में खदान मज़दूर बनना पड़ता है |

 
इंसान किस तरह अपनी ताकत का इस्तेमाल अपने से कमज़ोरों पर करता है और कैसे इस बात का इससे कोई सम्बन्ध नहीं होता कि वह इंसान कितना सक्षम है, मानव स्वाभाव की इस कठोर वास्तविकता को बखूबी दर्शाया गया है इस सीन में|
 
अँगरेज़ तो भारतियों पर अत्याचार कर ही रहे थे, पर भारतीय भी आपस में एक दुसरे पर अत्याचार करने में कोई कमी नहीं छोड़ रहे थे, जैसे रामाधीर सिंह अपने पाले गुंडों के दम पर शोषण करता हैं |
 
एक दुःखद घटना में शाहिद खान की गर्भवती पत्नी, बच्चे को जन्म देते देते अपने प्राण त्याग देती है, और शाहिद का खैरखा उस तक यह खबर समय पर नहीं पहुंचा पाता क्यूंकि रामाधीर के गुंडे ने उसको खदान के अंदर नहीं जाने दिया जहाँ शाहिद खान काम कर रहा था|
 
शाहिद खान उस गुंडे को सबके सामने ईंटे से पीट पीट कर मार डालता है, रामाधीर देखता रह जाता है| और शाहिद का खैरखा भी अपने आप को कोड़े से पीटता है, पात्र परिभाषा को स्थापित करने के लिए इस सीन को खूबसूरती से फिल्म में पिरोया गया है |
 
खैर, शाहिद खान की दिलेरी देख रामाधीर उसको अपना बाहुबली बना लेता है और फिर शाहिद भी, अपनी खुद की नौकरी और जान बचाने हेतु तथा बच्चे के भरण पोषण के लिए, अपने ज़मीर को मार कर मज़दूरों पर ज़ुल्म करते रहता है |
 
इसी बीच भारत स्वतंत्र हो जाता है और खदानों के मालिक तो बदलते हैं पर मज़दूरों के हालात नहीं, बस उन पर ज़ुल्म करने वाले बदल जाते हैं|
 
मानव समाज और मानव स्वाभाव की कई सारी बारीकियों को ख़ूबसूरती से दर्शाता एक और बेहतरीन सीन|

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